kuch kahi kuch unkahi...

अक्टूबर 19, 2011
कुछ कही कुछ अनकही सी बात रह जाती है  जब अपने होठो मैं बंद  कर लेता हु अपने अल्फाजो को  एक पल के लिए दिल से दिमाग  तक  पहुच जाते है विचार मेर...
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मई 04, 2011
समस्याए कहा खड़ी होती है जहा से हमारी आकांक्षाये जन्म लेती है ...अगर हमे खुद से सवालों के जवाब मिलने लग जाये तो हर मनुष्य प्रसन्न रहेगा मगर...
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मई 04, 2011
क्या पिछली बार की तरह इस बार भी तुम यु ही चुप रहोगी.. हर बार तुम्हारे होठो पर कुछ thehar  सा जाता है.. हर बार तुम्हारी पलकों से कुछ फिसलत...
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अप्रैल 28, 2011
वो उस दिन वो उस दिन सब कुछ बदल गया था वो तुम्हारा मुझ मैं मिल जाना सब कुछ मिल जाने जेसा ...
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अप्रैल 28, 2011
कॉलेज और अतीत कॉलेज का वो पहला दिन मन मैं कुछ ख्वाब सजाए । सपनों को पलकों पर बिठाए मेने रखा कदम । देख कर...
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अप्रैल 28, 2011
आज तुम्हारे हाथो के बीच के खालीपन को भरना चाहता हूँ ॥ आज तुम्हारी पलकों मैं बस जाना चाहता हु ... आज तुम्हारे कंधे पर ...
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अप्रैल 28, 2011
इस बार फिर वेसा कुछ नहीं हुआ जेसा होना चाहिए था ... इस बार फिर चाँद भिखारी के हाथो से निकल गया और वो बुखा रह गया ...
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